Look how pandita gajadhara bhujanga bhushana shast

आजकल धार्मिक-मार्मिक शील स्वभाव की और भक्तिरस की उपासना करनेवाली गृहिणियां कम ही देखने में आती हैं; कुछ मिल भी गयीं तो सासूव्रता नहीं होतीं।लेकिन श्रीमती लावण्यबाला अग्रवाल पति -वशीकरण मन्त्र-सिद्ध होने के साथ सिद्ध सासूव्रता भी थीं।सासूजी में उसकी अनन्य रति और भक्ति के कारण वो उनकी प्रथमप्रिय सुन्दर-सुमुखी बहूरानी का दर्जा हासिल कर चुकी थीं।वह धर्म-कर्म को भी बहुत मानतीं और अक्सर ही ब्राह्मणों को दान-पुन्न करती।इसलिये स्थानीय वैश्यसमाज में उनका काफी मान था।वह वैश्यकुल कुल-धर्म की दीपक-घृतबाती थी जिससे सच्ची श्रद्धा की सुगन्ध फूट निकलती; पण्डित और पुरोहितों को वह दिव्य दक्षिणा देती, सदैव।यूं तो कई पंडितों को वो खिला चुकी थी पर उसके खास यानी प्रधान पंडित थे गजधर भुजंगभूषण शास्त्री, एक तरह से कहा जाये तो वे ही लावण्यबाला के कुल-समुदाय के कुल-पंडित थे।लावण्य की सास भद्रावती भी धर्म-अनुष्ठान के कर्म में रुचि रखती पर भक्ति व साधना की प्रमुख जिम्मेदारी लावण्यबाला की ही थी, अलबत्ता उसकी दूसरे नम्बर की पुत्रवधू शशिकान्ता भी इस कार्य में सुन्दर सहयोग करती।
भद्रावती के पति रामलखनलाल का असमय देहान्त हो गया था, उनका हस्तशिल्प का व्यवसाय था जो अब उनके दो पुत्र मोहनलाल और सोहनलाल के जिम्मे हो गया,नगरमें दो अलग-अलग दिशाओं में इन दो भाइयों के भवन स्थित हैं।मोहन की परिणीता धर्मपत्नी श्रीमती लावण्यबाला है और सोहन की धर्मपत्नी है शशिकान्ता।दोनों रूपवती हैं; लावण्य 23 की है तो शशि 21 की।दोनों की सास भद्रावती अपने बड़े पुत्र मोहनलाल के यहां ही रहती है।मोहनलाल जी सुबह 9 बजे दूकान पर जाते हैं तो रात 9 बजे ही लौटते हैं।उनकी अनुपस्थिति में घर की सारी जिम्मेदारी लावण्यबाला और उसकी सास पर है।
भद्रावती 45 वर्ष की कांटे की औरत है, गोलमोल-मोटीमटंग। नितम्ब विशालाकार और स्तन भी भारी; पेट कुछ आगे आया हुआ। हां,उनकी दोनो बहूरानियां अलबत्ता तीखी तरुण रमणियां हैं।मंदिरगमन,शास्त्रश्रवण और घर में विशेष पूजापाठ केवल लावण्य रानी ही निभाती है , इस पवित्र कार्य में वह पंडित जी श्री भुजंगभूषण शास्त्री जी से पूरी सहायता लेती है।वह श्रद्धा और हुनर से हर महीने पंडित जी के घर कुछ-न-कुछ द्रव्य पहुंचाती है और हर दो महीने में अपने घर उन्हें विशेष भोजन हेतु आमन्त्रित करती है। भोजन के समय सास भद्रावती पंडित जी के लिये पंखा झलती है।
यह क्रम चल रहा था और इसमें कोई विघ्न नहीं आया था,अबतक; परन्तु इस एकादशी को जब पंडित जी भोजन को पहुंचे तो भद्रावती के स्थान पर लावण्यबाला उनकी सेवा में रही और भोजन परोसने और खिलाने का काम किया छोटी बहूरानी शशिकान्ता ने।एक नयी सेविका को देख पंडितजी ने विस्मय प्रकट किया तो लावण्य ने परिचय कराया।शशिकान्ता ने प्रिय वचनों से कहा -- '' पंडित जी सुख-स्वाद से खाइयेगा, मधुर रस के साथ लावण्य रस भी है ! '' पंडितजी शान्त भावसे खाते रहे, इस सुनसान व एकान्त वातावरण में दो तरुणी स्त्रियों की मस्त-कदम्ब जवानी का भी उन्हें कुछ-कुछ अनुभव होने लगा।
भोजन तृप्ति के पश्चात दोनों रमणियों ने निज कर-कमलों से उन्हें रजत-मुद्रा और अंगवस्त्र दान-दक्षिणा दी तो वे कृतकृत्य हो गये।वे प्रस्थान करने वाले ही थे कि शशिकान्ता रानी ने कहा -- '' पंडितजी, हमारी सासूजी आपको विशेष प्रयोजन से ऊपर एकान्त में बुला रही हैं ''।पंडितजी जब विशेष दान-दक्षिणा के लोभ में ऊपर पहुंचे तो उन्हें ऊपर का 'नजारा' ही कुछ और नजर आया।मसनद के सहारे पांव चौड़े कर लेटी भद्रावती पान खा रही थी,उसकी आंखों में एक खास अनोखी चमक थी। अत्यन्त आश्चर्य ! ! ! भद्रावती ने बेझिझक, आंख मार कर पूछा, '' पंडितजी ! मेरी दोनों बहूरानियां आपको कैसी लगीं ? '' पंडित जी 55 वर्ष के थे और विधुर भी , पर वे पशोपेश में रहे, बोले -- ''दोनों सुन्दरी और सुकुमारियां हैं, रूप की बहूरानियां हैं--आप भी धन्य हैं ! '' भद्रावती ने कहा -- '' देखिये,पंडितजी मैं शुद्ध हिन्दी नहीं जानती, साफ-साफ बताइये मुझे, दोनों मस्त माल है, आपका दिल उनकी 'लेने' की नहीं करता ? आपके लिये दोनों नंगी हो जायेंगी,तबीयत से मजा लो, बेझिझक बेशर्म, अरे पंडितजी ऐसा मौका बार-बार नही मिलेगा; अब बताओ ? ? ? '' ।यह कह कर उसने वो अश्लील इशारे किये कि पंडितजी की लार टपकने लगी और एकाएक लंड खड़ा हो गया। अब पंडित ने भी भद्रा को आंख मारी और फट से बोल पड़ा, '' चोदना तो चाहता हूं पर क्या वो तैयार हो जायेंगी मेरा लंड लेने को ? ? ''भद्रा हंसी और पंडित को अपने बदन पर खींच गिराया, बोली -- ''ये हुई ना बात ! वाह, ठीक, दोनों को रगड़ना , दोनों की फुद्दी पेलना; मगर पहले मेरी तसल्ली करो, मैं भी देखूं तुम्हारा लंड।" पंडित को अब अच्छी तरह से समझ में आ गया कि बहूरानियों की चूत लेनी है तो पहले सास को अपने लंड का मजा देना होगा।वह अब एक झटके में सास पर चढ़ गया और उसके तन-बदन को लोट-पलोट करते रौंदने लगा।कुछ ही देर में उसने उस अधेड़ औरत को फुल नंगी कर दिया।'' ले प्यारी'' कहते हुये उसने उस औरत के जोश से गाल मरोड़े और मुंह को उसके मम्मों पर ले चुम्माचाटी की, फिर चूची काट खायी।सास टांगें फटकारते हुये चिल्ला रही थी , '' साले, और जोर से रगड़, मुझे पटक-पछाड़, चोद चोद ! ! ''
सास भी हरामी थी, जैसे ही पंडित ने उसकी लेने उसकी चूत में लंड घुसेड़ना चाहा, उसने रोक दिया, बोली , '' पंडित पहले लंड नहीं,अंगुल करो, '' ''आह, आह ,हां तीन अंगुल भक्क से मेरी चूत में डाल दो'' , ''आह आह आह--- स्सी स्सी स्सी,--''।सास पंडित से भी ज्यादा तेज थी, उसने पहले इशारे से और फिर साफ लब्जों में बता दिया की उसे किस किस्म का मजा चाहिये।सास ने कहा -- '' पंडित, तुम रोज मेरी गांड मारो और अपने लौड़े से निकला वीर्य मेरे मुंह पर पोतो तो मैं तेरी गुलाम ; फिर तुम मेरी दोनो बहूरानियों को जी भर चोदो,जैसे चाहो वैसे, समझे ? '' ।
सुनते ही पंडित ने सास की गांड को लपेटा,पहले धौल जमाया, फिर गांड पर मुक्के मारे, फिर चुम्माचाटी करी, गांड को दांत से काटा,गांड के छेद में तिनका घुसाया, फिर अंगुल-- एक, दो, तीन, चार अंगुल; और आखिर में अपना लंड यानी लौड़ा।पंडित ने सास की गांड को भरपूर चौड़ा किया ,फिर गांड के छेद में लंड ठरकाया।उसका लंड सास की गांड मे बारबार पिस्टन की तरह जा-आ रहा था।खूब तबीयत से पंडित ने सासजी की गांड मारी।कमसे कम तीन घंटे लगातार। फिर उसने अपना अंडकोश सास के कंठ मे फंसाया और साली को कहा वो उसका आंड चूंसे।पंडित सास की गांड मारते वक्त उसकी चूत पर मुक्के भी ठोंक रहा था।उसने अपने पैरों से उस अधेड़ औरत की मोटी-फैली छातियों को रौंदा,घुटनों से गूंधा, ; पंडित ने सास की खूब-खूब गांड मारी।इस पूरी कुत्सित चुदाई के बाद उसने एक चाकू निकाला और चाकू की नौंक को उसकी गांड और चूत मे धकेला और चूंचीयों पर धार फिरायी।फिर उसकी गांड और पीठ पर लात मार बोला-- '' इसी तरह रोज तुझे रगडूंगा ! ! ! ! ! ! ! '' ।
इस काम क्रिया से सास बहुत संतुष्ट हुई।आधे घंटे विश्राम के बाद सास ने अपनी बड़ी बहूरानी लावण्यबाला को बुलाया और एक अलग कमरे में उसे पंडितजी की सेवा में सौंप दिया।कमरे में लावण्य साड़ी-पेटीकोट, ब्रा-ब्लाउज में लाज दर्शाती हुई अपना चेहरा ढके खड़ी थी।पंडित ने मजा लेते हुये उसकी नभि-दर्शना कमर से साड़ी सरकाना शुरू किया,फिर ब्लाउज उतारा,फिर ब्रा; बड़ी बहूरानी के नंगे-नंगे मम्मों को टटोल-टटोल देखने के बाद उसने पेटीकोट को खींच पटका; भीतर पेंटी थी उसे दांतों में दाब निकाल फेंकी्। अब छोरी मादरजात नंगी थी।अहा क्या माल था ! चिकना, अति कोमल मुलायम मांस; गदरायी जवानी, गरम लपटें मारती सांसें;आह नाभि के नीचे की जंघायें, उसके नीचे वो, वो प्यारी -सी 'चूत' यानी ' फुद्दी'।पंडित ने लावण्यबाला की जांघों से जांघें, पेट से पेट, छाती से छाती और चुत से लंड सटाने के बाद उसके शिर के लहराते बालों पर हाथ फिराया और उस नग्न कन्या के कोमल गुलाबी गालों को चूंसते हुए बोला--- आजा, आजा ; ले, ले मेरे लंड का मजा ! '' ।पंडित का हाथ अब बहूरानी की गुदाज गांड पर फिरने लगा।तभी सास भद्रावती वहां आ गयी और उसने अपनी प्यरी बहूरानी के कान मे कुछ कहा और एक प्याला शराब का भी पिलाया तकि वो पूरी बेशरम-बेहया हो पंडितजी को नंगा-नंगी बोल कर मजा दुगुना करे।जैसे ही बहू लावण्य शरूर में आयी सास भद्रा ने पंडित से कहा, -- ''पंडित अब इसकी चूत में लंड का झटका मारो ! ''पंडित भी बहूरानी से बोला, '' आजा, कस जा , चिपट जा मेरी बुलबुल !''वो नशे में लहराते हुए बोली--''पंडितजी ! ! ! ! ! ! ! * * * ! ! ! ! ''तभी सास ने उसे टोक दिया , '' इन्हें पंडितजी नहीं ''अंकल '' कहो ! !' जवाब मे बहूरानी भी तपाक से बोल पड़ी -- '' आह, अंकल ; आप भी मुझे बहूरानी ना कहो, मुझे छोरी,छोकरी, मुन्नी, गुड़िया या कुछ और कहो, आह 'ये' तो गरम-गरम है ! ''क्या ? '' सास जोरसे बोली। जवाब में सेक्सी छोरी बोली सासू-मां से - - - '' अंकल का लौड़ा ''; -- ''तुझे अंकल का लौड़ा पसंद है बेटी! ! '' "" मांजी ,ये अंकल का मोटा लंड मेरी चुत मे कसमसा रहा, हाये ! ! '' ।तभी पंडित बोला , --- '' बेटी, तू भी अपनी चूत उचका ! जवाब मिला , -- '' पापा ! लो उचकाई, लो बेटी की चुत का मजा लो '', इस मोड़ पर सास भद्रा अपनी बहू की गांड से एकदम सट गयी,ग़ांड को पीछेसे धक्का लगा तो पंडित का लंड उस छोरी की चूत में 4 इन्च एक ही बार मे घुस गया।सास ने अपनी मोटी चूत को गांड के बल उछाल आगे बहू की गांड पर धक्काधक्क किया तो 'अंकल' का लौड़ा 4 इन्च और आगे उस छोरी की चूत में सरक गया।
पंडित बड़बड़ाया, -- '' बेटी को पहली खेप में दो घंटे से ज्यादा नही चोदुंगा, दर्द होगा।'' मगर मां बोली '' नही साली को रगड़-रग्गड़ अध-बेहोश करदो '' । ''ठीक है'', पंडित की शह पर सास ने बहूरानी को उसकी दोनों टांगें पकड़ घसीटा, उलटा किया ताकि पंडित उसे कुतिया बना चोद सके; यानी गांड की तरफ से चूत की धुनायी।कुतिया-स्टाइल में बेटी चोदने के बाद अंकल ने उसे अपनी गोद में बिठाया कुछ इस तरह से जिससे अंकल का फुफकार मारता लंड उस छोकरी की गांड मे घप्प से घुस जाये, क्योंकि पंडित बेटी की गांड मारने का भी मजा ले लेना चाहता था।अब जैसे ही लावण्य की कड़क गांड में अंकल का मुस्टंडा लंड घुसा वो चिल्लाई, -- '' हाये अंकल ये क्या कर रहे हो ? '' अंकल फुसफुसाकर बोले, -- '' तेरी गांड मार रहा हूं, मुन्नी ! ले गांड मरवा ! ! '' । बोली वो -- '' अंकल ,छोकरी की ''गांड मारने'' मे सचमुच मजा आता है आपको ? '' । '' हां, बहुत मजा आता है, मैनें तो तेरी मां की भी 'गांड'' मारी है; तू ठीक से गांड मरवा! ! '' ।'' आह अंकल शरम लग रही !''। मगर पंडित ने दबादब शंटिंग की तो पूरा 9 इन्च लंड छोरी रानी की गांड में धंस गया, और वो रोने-चिल्लने लगी ''हाये मैं मर गयी; आह, आह aaaaaaaaaaaaahhhh'' aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhh

10年前
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