बकरी चराने का मजा
ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने मायके में रहती थी और जवान हो गयी थी, सबकुछ समझने लगी थी। औरत और मर्द के हर रिश्ते को जान चुकी थी। गरीबी घर में पैदा हुयी थी इस लिये घर में बकरियाँ भी थी जिसे मेरी बहन चराने ले जाती थी। क्योंकि मां अक्सर दसरे के घरों में काम करने जाती थी। बड़ी बहन के साथ साथ कभी मैं भी जाती थी। कुछ दिन पहले ही बड़ी बहन की शादी तय हुयी थी लेकिन न जाने क्यों शादी टूट गयी। फिर माँ खुब दीदी को गाली दी। मैं समझ नहीं पायी। फिर माँ ने दीदी को बोली कि बकरी चराने नहीं जाना है। बकरी चराने का काम मुझे मिल गया। मेरे पास कुल चार बकरियाँ थी। दोपहर बाद मैं बकरी चराने जाने लगी। माँ बोली कि बकरी ले कर गाँव के पास ही बगीचे में ले जाना है। गाँव से कुछ दूर पर बने पोखरे के पास जाने से माँ ने मना किया। मैं कुछ दिन रोज दोपहर के बाद बकरियों को ले कर पास के बगीचे में ले जाती लेकिन वहीं पर मेरी दीदी की सहेली कजरी भी अपनी बकरियों के ले कर आने लगी। कजरी बार बार मेरी दीदी के बारे में पूछी कि वो क्यों नहीं आ रही है।
मैंने देखा कि कजरी के पीछे पीछे गाँव के दो मरद भी अपनी भैंसो को ले कर आते थे। दोनो मरदों की उमर ३५ से ४० के बीच में थी। दोनो हट्टे कट्टे थे। दोनो के हाथ में एक एक लाठी रहती। कजरी की उमर मेरी दीदी के बराबर थी। उस समय कोई २२ साल रही होगी। कजरी अक्सर उन मरदों के साथ बात भी करती थी। कुछ देर बाद कजरी अपनी बकरियों को लेकर सुनसान पोखरे की ओर चली जाती और उसके पीछे पीछे दोनो मरद भी अपनी भैंसो को लेकर चले जाते। मैं बगीचे मे ही रह जाती। माँ ने मुझे उस दूर पर सुनसान पोखरे पर जाने से मना की थी।
दुसरे दिन कजरी अपनी बकरियों के साथ आयी उसके पीछे दोनो मरद परभू और जोखू अपने भैंसो को चराने के लिये उस बगीचे में ले कर आये। फिर उन मरदों में से एक मरद परभू ने मेरी दीदी के बारे मे पूछा -क्यों रे तेरी दीदी काहे नहीं आती है बकरी चराने?
मै बोली – पता नाहीँ।
परभू- तोर माई हरामजादी हौ.. वही मना कइले होई... ।
मै- हमके ना मालूम।
जोखू – तोके ना मालूम त... बकरी यहां कहाँ चरावेली... चल पोखरा पे.. वहाँ हरी हरी घास हौ...
परभू- तोर दीदीया वहीं चरावे ले जात रहल .. पूछ ले कजरी से .. का रे कजरी ..बोल
कजरी- हाँ रे रगिनी...
जोखू- चल बकरी हाँक के ले चल ...
मैं- नाँही... माई मारे लागी...
परभू- काँहे रे .. तोर दीदीया त चरावे जात रहल ... त तोंके तोर माई काहें मारे लागी..
मैं- माई पोखरा प जाये से मना कइले हौ...
जोखू- तोर माई ना जाले का पोखरा पे.... आधी आधी रात के पोखरा पे जाले तोर माई...
परभू- उ हरामजादी एकरे दीदीया के मना कइले होई ... साली खुद त लण्डखोर हौ गाँव भर के लण्ड खा के मोटा गइल हौ....
जोखू- पोखरा पे के घास केतना हरी हरी हौ... वहीं ले चल .. देख कजरी के बकरी केतनी मस्त ताजी है सब.. कजरी रोज पोखरा पे आपन बकरी चरावेले .... त हूं ले चल
परभू- तोर माई कुछ ना बोली .. कह दीहै कि कजरी दीदी के साथ गइल रहले
जोखू- तैं अपनी माई से मत डेरो... उ हम दोनो के सामने कुछ ना बोली...
परभू- और क्या .. उ हम दोनो के सामने मुंह नाहीं देखा सकत.. हम दूनो के खइले हौ..
कजरी- धत्त .. का बोलेला लोगन .. लाज नाही आवत ..
जोखू- तब का ..येकरी माई के तो हम खूदे सौ सौ बार चाँपले होब .. बड़ी तेज हौ रे कजरी
कजरी- हमसे मत बोला इ सब .. हम इ सब बात नाहीं करती... छी छी
परभू- रे रागिनीया .. चल बकरी ले के आपन ..
जोखू- चल रे ...
मैं- माई मारे लागी तब
परभू- माई का मारी .. माई के गाँण्ड हम खुद मार देब
कजरी- एकदम से बदमास हउवा लोगन... बोले मे शरम नाही आवत
परभू- का शरम रे का शरम... उ एकर माई के हमसे बढिया के जानी..
जोखू- हाँ .. कुतिया हौ.. गच गच लील जाले...
परभू- गहीर बुर के हौ... हा हा
उसके बाद दोनो मरद अपनी भैंसो को पोखरे की ओर हाँक कर ले जाने लगे कजरी अपनी बकरी को भी हाँक कर ले जाने लगी फिर परभू पीछे आ कर मेरी भी बकरियों को हाँक कर ले जाने लगे। मेरी बकरियां भी कजरी के बकरियों के साथ तेजी से पोखरे की ओर जाने लगी। मेरे मन में मां की डाँट का डर सताने लगा। मैं भी मना करने के साथ बकरियों के पीछे पीछे भागने लगी। भाग कर कजरी दीदी से बोली मैं- दीदी .. मेरी माँ जान जायेगी तो बहुत मारेगी परभू- चल तेरी माँ नहीं जानेगी.. तू चल पोखरे पर
जोखू- फिकर मत कर रे .. कुछ नहीं होगा..
कजरी- चल जब ये दोनो मान ही नही रहे तो क्या बताउ..
दोपहर के समय कुछ देर में ही हम चारो उस पोखरे पर पहुंच गये। पोखरा काफी सुनसान जगह पर था। पोखरा के चारो और जंगल की तरह पेड़ उगे थे। सरपत और घास फुस बहुत उगे थे। कोई दिखाई नहीं दे रहा था। दोनो लोग की भैंसे तुरंत पोखरे के पानी में एक एक करके घुस गयीं। कजरी दीदी की बकरियां पोखरे के किनारे उगे घास को चरने लगीँ। मेरी भी बकरियाँ उन बकरियों में ही चरने लगीं। मैं और कजरी दीदी पोखरे के एक किनारे पर खड़ी होकर पोखरे की पानी में भैंसो के तरावट लेने को देखने लगीं। तभी कजरी दीदी मुझे इशारे से पोखरे के एक किनारे ले गयी और कुछ आड़ मे आ कर बोली
कजरी- पेशाब करबी त कर ले यहाँ
इतना कह कर अपनी सलवार को मेरे सामने ही खोल कर नीचे कर दी फिर लाल रंग की चडढी को सरका दी। मैं देखी कि कजरी दीदी की बुर पर खुब झाँट उगे थे खुब घने घने और काले काले। मैं देख कर एकदम से शरमा गयी। लेकिन कजरी दीदी तुरंत बैठ कर मूतने लगी। मूतने के बाद उठी और मेरे सामने ही बुर के उपर चडढी को सरकायी फिर सलवार को उपर करके नाड़ा बांध ली। फिर मुझसे बोली कजरी- मूतबी त मूत ले रे ... का लजात हयी .. यहां के हू नइखे मूत ले.. कच्छी सरका के
मूझे भी कुछ पेशाब लगी थी मैं फ्राक के नीचे चड़्ढी पहनी थी। मैने फ्राक के नीचे की चड़ढी को सरका कर मूतने के लिये बैठ गयी। कजरी मेरी बुर पर ही नजर लगाये रखी। फिर बोली कजरी- रगिनिया रे ..तैं आपन झाँट बनावेली का रे ..
मैं- धत्त दीदी .. नाही.. कजरी- त तोर झाँट नाहीँ देखात बा.. मैं- नांही दीदी
कजरी- देखाव केतना झाँट हौ तोर ...
continue...............
मैंने देखा कि कजरी के पीछे पीछे गाँव के दो मरद भी अपनी भैंसो को ले कर आते थे। दोनो मरदों की उमर ३५ से ४० के बीच में थी। दोनो हट्टे कट्टे थे। दोनो के हाथ में एक एक लाठी रहती। कजरी की उमर मेरी दीदी के बराबर थी। उस समय कोई २२ साल रही होगी। कजरी अक्सर उन मरदों के साथ बात भी करती थी। कुछ देर बाद कजरी अपनी बकरियों को लेकर सुनसान पोखरे की ओर चली जाती और उसके पीछे पीछे दोनो मरद भी अपनी भैंसो को लेकर चले जाते। मैं बगीचे मे ही रह जाती। माँ ने मुझे उस दूर पर सुनसान पोखरे पर जाने से मना की थी।
दुसरे दिन कजरी अपनी बकरियों के साथ आयी उसके पीछे दोनो मरद परभू और जोखू अपने भैंसो को चराने के लिये उस बगीचे में ले कर आये। फिर उन मरदों में से एक मरद परभू ने मेरी दीदी के बारे मे पूछा -क्यों रे तेरी दीदी काहे नहीं आती है बकरी चराने?
मै बोली – पता नाहीँ।
परभू- तोर माई हरामजादी हौ.. वही मना कइले होई... ।
मै- हमके ना मालूम।
जोखू – तोके ना मालूम त... बकरी यहां कहाँ चरावेली... चल पोखरा पे.. वहाँ हरी हरी घास हौ...
परभू- तोर दीदीया वहीं चरावे ले जात रहल .. पूछ ले कजरी से .. का रे कजरी ..बोल
कजरी- हाँ रे रगिनी...
जोखू- चल बकरी हाँक के ले चल ...
मैं- नाँही... माई मारे लागी...
परभू- काँहे रे .. तोर दीदीया त चरावे जात रहल ... त तोंके तोर माई काहें मारे लागी..
मैं- माई पोखरा प जाये से मना कइले हौ...
जोखू- तोर माई ना जाले का पोखरा पे.... आधी आधी रात के पोखरा पे जाले तोर माई...
परभू- उ हरामजादी एकरे दीदीया के मना कइले होई ... साली खुद त लण्डखोर हौ गाँव भर के लण्ड खा के मोटा गइल हौ....
जोखू- पोखरा पे के घास केतना हरी हरी हौ... वहीं ले चल .. देख कजरी के बकरी केतनी मस्त ताजी है सब.. कजरी रोज पोखरा पे आपन बकरी चरावेले .... त हूं ले चल
परभू- तोर माई कुछ ना बोली .. कह दीहै कि कजरी दीदी के साथ गइल रहले
जोखू- तैं अपनी माई से मत डेरो... उ हम दोनो के सामने कुछ ना बोली...
परभू- और क्या .. उ हम दोनो के सामने मुंह नाहीं देखा सकत.. हम दूनो के खइले हौ..
कजरी- धत्त .. का बोलेला लोगन .. लाज नाही आवत ..
जोखू- तब का ..येकरी माई के तो हम खूदे सौ सौ बार चाँपले होब .. बड़ी तेज हौ रे कजरी
कजरी- हमसे मत बोला इ सब .. हम इ सब बात नाहीं करती... छी छी
परभू- रे रागिनीया .. चल बकरी ले के आपन ..
जोखू- चल रे ...
मैं- माई मारे लागी तब
परभू- माई का मारी .. माई के गाँण्ड हम खुद मार देब
कजरी- एकदम से बदमास हउवा लोगन... बोले मे शरम नाही आवत
परभू- का शरम रे का शरम... उ एकर माई के हमसे बढिया के जानी..
जोखू- हाँ .. कुतिया हौ.. गच गच लील जाले...
परभू- गहीर बुर के हौ... हा हा
उसके बाद दोनो मरद अपनी भैंसो को पोखरे की ओर हाँक कर ले जाने लगे कजरी अपनी बकरी को भी हाँक कर ले जाने लगी फिर परभू पीछे आ कर मेरी भी बकरियों को हाँक कर ले जाने लगे। मेरी बकरियां भी कजरी के बकरियों के साथ तेजी से पोखरे की ओर जाने लगी। मेरे मन में मां की डाँट का डर सताने लगा। मैं भी मना करने के साथ बकरियों के पीछे पीछे भागने लगी। भाग कर कजरी दीदी से बोली मैं- दीदी .. मेरी माँ जान जायेगी तो बहुत मारेगी परभू- चल तेरी माँ नहीं जानेगी.. तू चल पोखरे पर
जोखू- फिकर मत कर रे .. कुछ नहीं होगा..
कजरी- चल जब ये दोनो मान ही नही रहे तो क्या बताउ..
दोपहर के समय कुछ देर में ही हम चारो उस पोखरे पर पहुंच गये। पोखरा काफी सुनसान जगह पर था। पोखरा के चारो और जंगल की तरह पेड़ उगे थे। सरपत और घास फुस बहुत उगे थे। कोई दिखाई नहीं दे रहा था। दोनो लोग की भैंसे तुरंत पोखरे के पानी में एक एक करके घुस गयीं। कजरी दीदी की बकरियां पोखरे के किनारे उगे घास को चरने लगीँ। मेरी भी बकरियाँ उन बकरियों में ही चरने लगीं। मैं और कजरी दीदी पोखरे के एक किनारे पर खड़ी होकर पोखरे की पानी में भैंसो के तरावट लेने को देखने लगीं। तभी कजरी दीदी मुझे इशारे से पोखरे के एक किनारे ले गयी और कुछ आड़ मे आ कर बोली
कजरी- पेशाब करबी त कर ले यहाँ
इतना कह कर अपनी सलवार को मेरे सामने ही खोल कर नीचे कर दी फिर लाल रंग की चडढी को सरका दी। मैं देखी कि कजरी दीदी की बुर पर खुब झाँट उगे थे खुब घने घने और काले काले। मैं देख कर एकदम से शरमा गयी। लेकिन कजरी दीदी तुरंत बैठ कर मूतने लगी। मूतने के बाद उठी और मेरे सामने ही बुर के उपर चडढी को सरकायी फिर सलवार को उपर करके नाड़ा बांध ली। फिर मुझसे बोली कजरी- मूतबी त मूत ले रे ... का लजात हयी .. यहां के हू नइखे मूत ले.. कच्छी सरका के
मूझे भी कुछ पेशाब लगी थी मैं फ्राक के नीचे चड़्ढी पहनी थी। मैने फ्राक के नीचे की चड़ढी को सरका कर मूतने के लिये बैठ गयी। कजरी मेरी बुर पर ही नजर लगाये रखी। फिर बोली कजरी- रगिनिया रे ..तैं आपन झाँट बनावेली का रे ..
मैं- धत्त दीदी .. नाही.. कजरी- त तोर झाँट नाहीँ देखात बा.. मैं- नांही दीदी
कजरी- देखाव केतना झाँट हौ तोर ...
continue...............
9年前