ऐसे बना चंद्रप्रकाश से चंदा रानी

मेरे माँ बाप ने मेरा नाम चंद्रप्रकाश रखा. एक कस्बे का रहने वाला था. हायर सेकेंडरी के बाद भोपाल पढ़ने के लिए गया. एक बड़े सरकारी कॉलेज में मैंने बी.ए. में एडमिशन ले लिया. भोपाल बहुत बड़ा शहर है. बड़ी बड़ी इमारतें हैं, खूब मोटर गाड़ियाँ चलती हैं, कई सिनेमाघर हैं.
मेरे जीवन की पहली घटना वहीं हुई, जिसने मेरे अंदर छिपी हुई लड़की को बाहर निकाल दिया.

वो रविवार का दिन था और जुली सिनेमा हाल में बहुत भीड़ थी. अमिताभ बच्चन जी की एक प्रसिद्ध फिल्म लावारिस लगी हुई थी. टिकट लेने वालों की लाइन बहुत लम्बी थी. मैं भी लाइन में लग गया.
दस मिनट बाद ही टिकट खिड़की बंद हो गई तो मैं निराश हो गया. मैं सिनेमा परिसर में बनी हुई चाय की गुमटी के बाहर खड़े होकर चाय पीने लगा.

उसी समय वहां कोई चालीस साल के एक अंकल आये और मुझसे बात करने लगे- स्कूल में पढ़ते हो बेटा?
मैं- नहीं अंकल, कॉलेज में पढ़ता हूँ.
अंकल- फिल्म देखने आये हो? टिकिट मिल गयी?
मैं- टिकेट नहीं मिली अंकल जी, मेरा तो पूरा मूड खराब हो गया, लेकिन अब अगले शो में कोशिश करूंगा.
अंकल- अगर तुम्हें इसी शो का टिकिट मिल जाए तो?
मैं- तो मजा आ जायेगा अंकल!

अंकल ने अपने जेब से दो टिकिट निकाली और मेरे सामने कर दी और बात आगे बढ़ाई- मेरे पास दो टिकिट हैं. मैं दिखा सकता हूँ तुम्हें यह फिल्म.
मैं- अरे वाह !! मजा आ जाएगा. बताओ अंकल, कितने रूपये में दोगे टिकिट?
अंकल- फ्री में दूंगा. कितनी उम्र है तुम्हारी?
मैं- अठारह साल.
अंकल- नाम?
मैं- चंद्रप्रकाश.

अंकल मुझे ध्यान से देखने लगे. लगभग पांच फीट हाईट थी मेरी. रंग एकदम गोरा था. चेहरा भरा हुआ. आँखें बड़ी बड़ी. गोल गोल गाल. मैं न ज्यादा दुबला और न ही ज्यादा मोटा था. छोटे कस्बे का रहने वाला था. सीना थोड़ा उभरा हुआ था. ढीला पैन्ट और रंगीन शर्ट पहनी थी जिस पर बड़े बड़े फूल बने हुए थे. शर्टिंग की हुई थी. पीठ से नीचे का भाग उभरा हुआ था.

फिर उन्होंने अपने शर्ट को ऊँचा किया और पैन्ट की चेन वाले स्थान पर अपना हाथ रखकर बोले- चलो बेटा, तुम भी क्या याद रखोगे? मैं दिखता हूँ तुम्हें फिल्म.
उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया और यह कहते हुए वाशरूम की तरफ ले गये कि चलो आते हैं.

वाशरूम में तीस से अधिक कम्पार्टमेंट बने थे, सभी फुल थे. हम खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे. एक आदमी हटा तो मैंने अंकल को जाने का इशारा किया. अंकल नहीं गये. जब एक साथ दो कम्पार्टमेंट खाली हुए थे मेरा हाथ पकड़कर अंकल आगे बढ़े. मुझे आवश्यकता नहीं थी. मगर मैं भी उनके साथ चला गया. मैं खुश था कि मुझे फिल्म देखने को मिल रही है.

अंकल के सीधे हाथ में मेरा उल्टा हाथ था, उसको छोड़े बिना उन्होंने उलटे हाथ से अपने पैन्ट की चेन खोली और पेशाब करने लगे. मुझे लगी तो नहीं थी मगर मैंने भी अपने सीधे हाथ से चेन खोली और कोशिश करने लगा. मुश्किल से दो चार बूँदें निकलीं.

अंकल की तरफ से जोर से आवाज आ रही थी. उन्होंने मेरे हाथ को झटका दिया. मैंने उनकी तरफ देखा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए नीचे की तरफ इशारा किया. उनके लंड से मोटी धार निकाल रही थी. मैंने तुरंत ही अपनी नजर हटा ली.
वाशरूम से बाहर निकलते वक्त अंकल ने अपना हाथ मेरी कमर पर रख दिया और उँगलियों से मेरी पसली दबाने लगे.

सिनेमा हाल में अंदर जाने के दरवाजे खुल गये थे. मैं अंकल के साथ अंदर जाने लगा. अब उनका हाथ मेरी कमर से नीचे था. एक दो बार उन्होंने मेरे कूल्हे पर थपकी भी दी.
अरे वाह!! अंकल के पास तो बालकनी के टिकट थे.

उन्होंने कारीडोर से पोपकोर्न और लिम्का की दो सौ एम एल की बोतल ली. बोतल मेरे हाथ में थमा दी और अंदर चले गये. कॉर्नर वाली सीटें थीं हमारी, जाकर बैठ गये.
अंकल ने मुझे कोने वाली सीट पर बैठाया.
धीरे धीरे टाकीज पूरा भर गया.

अमिताभ बच्चन का दौर था. फिल्म चालू हुई. अंकल ने पोपकोर्न का पैकेट खोला. सीधा हाथ मेरे कंधे पर रख दिया और पोपकोर्न मेरे मुंह के सामने किये. मैंने उसमें से एक दो पोपकोर्न लिए और खाने लगा.
अंकल ने थैली अपनी गोद में रख ली और मुझसे बोले- खाते भी जाओ.
मैं बीच बीच में पोपकोर्न लेते जा रहा था. अंकल का सीधा हाथ अब कंधे से नीचे उतरकर मेरे दायें सीने पर आ गया था.

इस बार जैसे ही मैंने अपना हाथ पोपकोर्न की तरफ बढ़ाया तो पोपकोर्न की जगह हाथ किसी गर्म और लम्बी वस्तु पर चला गया. अंकल ने मेरा हाथ पकड़कर दबा दिया. मैं कुछ समझ पाता, इसी बीच उन्होंने मेरे सीने को दबाना और सहलाना शुरू कर दिया और धीरे से मेरे कान में बोले- बेटा तुम बहुत सुंदर हो. तुम एकदम लडकी की तरह हो. मैंने तुम्हें फिल्म दिखा रहा हूँ ना. तुम्हें मजा आ रहा है ना. तो थोड़ा मजा मुझे भी दे दो.
मैंने परदे की तरफ देखते हुए पूछा- मैं क्या करूं अंकल?
अंकल बोले- बस मेरे लंड की मालिश करते रहो!

मैंने अपने गोरे गोरे हाथ से उनके लंड को पकड़ लिया और ऊपर नीचे करने लगा. कस्बे में दो चार बार मैं अपनी मुठ मारी थी. बस उसी तरह अंकल का लंड हिलाने लगा. अपने हाथ से अंदाज लगाया कि उनका लंड बहुत बड़ा और मोटा था; एकदम गर्म था उनका लंड.

अब अंकल ने मेरी शर्ट के अंदर हाथ डाल दिया और मेरी चूची को सहलाने लगे.
आँखें मेरी परदे पर थी मगर ध्यान हट चुका था. आधा घंटा तक मैं अंकल की मुठ मारता रहा. तभी अंकल ने कसकर मेरे सीने को मुट्ठी में भर लिया और जिस हाथ से मैं मुठ मार रहा था, वह अंकल के गर्म वीर्य से गीला हो गया.

उन्होंने धीरे से मेरे हाथ को हटाया, अपने लंड को अंदर किया.
लिम्का की बोतल खोली और मेरी तरफ बढ़ा दी. मैंने कुछ घूंट पिए.
अंकल ने कहा- मुंह लगाकर पियो और फिर मुझे दे दो.
मैंने उनकी बात मानी. अंकल मेरी झूठी लिम्का पीने लगे.

फिर मेरे कंधे पर सिर रखकर कान में बोले- थेंक्स बेटा.

मैंने कुछ नहीं कहा लेकिन अब फिल्म देखने में मेरा मन नहीं लग रहा था. सामने परदे पर अमिताभ था. मैं उसके चेहरे को न देखकर उसकी चेन को देख रहा था.
इंटरवल होते ही हम बाहर निकले.

अंकल ने मेरी कमर को पकड़ रखा था. बाहर आते ही बोले- बेटा! चलो मेरे घर होकर आते हैं. वो सामने ही मेरा घर है. दस मिनट में आ जायेंगे.
एक बिल्डिंग में उनका घर था. एक कमरा, एक किचन और एक बेडरूम. अंदर घुसते ही उन्होंने दरवाजा बंद किया. मुझे बेडरूम में ले गये और कसकर लिपटा लिया.

मैं सम्मोहित सा उनके इशारे पर हरकतें करने लगा. उन्होंने मुझे जी भरकर चूमा. मेरे शर्ट और पैन्ट को खोला. अंडरवियर भी निकाल दी. मेरा चेहरा दीवार की तरफ करके वो नीचे बैठ गये और मेरे कूल्हों को धीरे धीरे काटने लगे.

उन्होंने अपने भी कपड़े खोल दिए. वो लम्बे चौड़े थे. उनका लंड लटका हुआ था. कोई पांच इंच का होगा. मेरा लंड तीन इंच का था उस समय. जब मेरा लंड खड़ा होता था तब वह साढ़े चार इंच का हो जाता था.
अंकल का लंड बिना खड़ा हुआ ही पांच इंच का था. मोटा भी बहुत था. रंग काला था.

वो बेड पर बैठ गये, मेरा चेहरा पकड़कर अपने लंड के सामने किया. अब उनका लंड खड़ा होने लगा था, धीरे धीरे झटके मार रहा था. एक हाथ से लंड पकड़कर वो मेरे गाल और होंठों पर रगड़ने लगे.
मुझे मुंह खोलने को बोला और मेरे मुंह में लंड डाल दिया तथा ऊपर नीचे करने लगे. मेरा दिमाग पूरा सुन्न हो गया था.

अंकल अपने दोनों हाथों से मेरी पीठ मसलने लगे. थोड़ी देर बाद उन्होंने पास में पड़ी तेल की शीशी उठाई और मेरी पीठ पर बहुत सारा तेल डाल दिया. तेल को बहते हुए वे पीठ के नीचे ले गये. तेल की धार मेरी गांड की दरार से बहती हुई नीचे फर्श पर टपकने लगी.

उन्होंने तेल से सनी उंगलियाँ मेरी गांड की दरार में घुमाना प्रारम्भ किया और फिर वे छेद को कुरेदने लगे. कुछ ही देर में उनकी उंगली मेरी गांड में अंदर बाहर हो रही थी.
उन्होंने मुझे बेड पर उल्टा सुलाया, मेरे पेट को पकड़कर ऊपर उठाया. घुटने पेट के नीचे किये. अब मेरे कूल्हे ऊपर उठ चुके थे. उन्होंने अपना लंड गांड की दरार पर चार पांच बार फिराया और फिर छेद पर रखकर जोर से दबाया.

यह पहली ही बार था मेरे लिए तो मुझे दर्द हो रहा था. मगर चेतना लुप्त हो गयी थी. मैं कोई विरोध नहीं कर रहा था. धीरे धीरे पूरा लंड मेरी गांड के अंदर था.
दस मिनट तक उन्होंने मेरी गांड मारी और फिर वहीं वीर्यपात कर दिया.
मैं उलटा होकर लेटा रहा.

कुछ मिनट बाद उन्होंने मुझे आवाज दी- चंदा उठो! सो गयी हो क्या?
मैं सीधा हुआ, मैंने कहा- अंकल, मेरा नाम चंदा नहीं चंद्रप्रकाश है.
वो बोले- आज से तुम सारे जमाने के लिए चन्द्रप्रकाश हो. मगर मेरे लिए चंदा हो. मेरी चंदा … चंदा रानी.
मैं- चंदा, चंदा रानी, मगर मैं तो लड़का हूँ अंकल.

अंकल- अब तुम मुझे अंकल मत बोलो. मेरा नाम सत्यम है, मैं एक कम्पनी में नौकरी करता हूँ. मैं इस दुनिया में अकेला हूँ. मुझे गांड मारने का शौक है. हर रविवार दो टिकट लेता हूँ और किसी की गांड मारता हूँ. मगर आज तुम्हारी गांड मारकर मुझे जो सुख मिला वो वैसा ही है जैसा मेरी वाइफ को चोद कर मिला था. मेरी वाइफ का नाम चांदनी था और मैं उसे चंदा कहा करता था. आज से तुम मेरी चंदा हो और मैं तुम्हारा हसबेंड हूँ. बोलो बनोगी ना मेरी चंदा. मैं तुम्हें अच्छे से रखूंगा. पढ़ाई में भी तुम्हारी मदद करूँगा. बस तुम हफ्ते में एक बार मेरा लंड चूसना और मुझसे गांड मरवाना. मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करूंगा.

मैं एक नई दुनिया में था. ऐसा लग रहा था जैसे मैं उनका गुलाम हो गया था. मैं जानता था कि मेरा लंड छोटा है, लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था कि मेरे अंदर लड़की वाले गुण हैं. मैंने हां में सिर हिलाया.
उन्होंने मुझे उठाकर अपने सीने से लगा लिया, वो रोने लगे, सिसकते हुए बोले- देखा चांदनी! तुम्हारी लाश को विदा करते हुए मैंने कहा था न कि मैं तुम्हारा रास्ता देखूंगा और तुम आओगी. तुम आ गयी हो चांदनी. सिर्फ मेरी चांदनी … मेरी चंदा.

मैं सत्यम से लिपट गया, मुझे लग रहा था कि मैं उनकी वाइफ हूँ. मैं ही चांदनी हूँ. चंदा … चन्द्रप्रकाश को चंदा करना कितना सही है ना.

उस दिन सत्यम मुझे बाजार ले गये. बहुत सारी शॉपिंग करवाई. उसमें काजल, बिंदी, पावडर, ब्रा, पैन्टी और सलवार सूट भी थे. मेरे मोहल्ले तक मुझे छोड़ने भी आये.
जाते जाते उन्होंने पूछा- अब कब मिलेंगे चंदा?
मैंने इठलाते हुए कहा था- अगले रविवार आउंगी सत्यम. अब चंदा सिर्फ तुम्हारी है. और हाँ अब टिकट लेने की जरूरत नहीं है. मैं सीधे तुम्हारे घर आऊँगी. मेरा रास्ता देखना सत्यम!
発行者 crossyravi
7年前
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